How to live a happy life
स्वस्थ और सुखी जीवन जीना जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है. दुनिया में दो किस्म के लोग हैं,एक वे जो औरों से उनका जीवन छीनने के भूखे हैं, दूसरे वे जो सुख से जीने के लिए तरस रहे हैं. जो औरों के जीवन के भूखे हैं, वह रुग्णचित्त है और जो जीने के लिए तरस रहे हैं,वह किसी- न- किसी मानसिक अथवा व्यवहारिक कठिनाई से जूझ रहे हैं. दुनिया में दुख के बहुत रूप है. किसी के घर संतान पैदा होने पर खुशियां मनाई जाती है तो किसी के घर संतान पैदा होने पर आंसू बहाए जाते हैं यह सोच कर कि पहले से ही तीन लड़कियां हैं अब चौथे का भरण पोषण कैसे होगा! संभव है जन्म किसी को सुख भी दे, पर रोग, भुखमरी, बेरोजगारी, बुढ़ापा और मृत्यु की घटना भला किसे सुख देती होगी!दुनिया में लाखों करोड़ों अस्पताल और चिकित्सकों के होने के बावजूद दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी बीमार और दुखी है.
सुखी जीवन का राज
यह मनुष्य की विडंबना है कि वह केवल धन संपत्ति और सुविधा साधनों को ही जीवन के सुखों का मूल आधार मानता है, जबकि एक अधिसंपन्न संभ्रात व्यक्ति जितना चिंतित, तनावग्रस्त और रुग्णचित्त मिलेगा, उतना एक सामान्य व्यक्ति नहीं. सामान्य व्यक्ति की चिंता हजारों की होती है, पंरतु अमीर की चिंता करोड़ों की होती है. चिंता सबको होती है, किसी पर हजार का लोड है तो किसी पर करोड़ का. जरा किसी पैसे वाले व्यक्ति पर ध्यान देकर देखें,उनकी सेवा में दस - दस गाड़ी बंगले नौकर - चाकर मिल जाएंगे, उनके भागम-भाग जिंदगी में इतनी भी फुर्सत नहीं कि वह अपने बच्चों को प्यार दे सके; माता पिता और भाई बहनों के सुख दुख में सहभागी हो सके. उसे दिन में कोर्ट और फैक्ट्री के लफड़े निपटाने होते हैं.
गरीब और अमीर के भोजन में केवल इतना-सा फर्क होता है कि गरीब को खाना उसकी पत्नी बना कर खिलाती है और अमीर को खाना नौकर-चाकर बनाकर खिलाते हैं.कुछ अमीर आदमी तो इतना ज्यादा खाते हैं कि वह खा-खा कर गोभी के फूल हो चुके हैं, वहीं कुछ अमीर आदमी ऐसे हैं जो भरपेट भोजन नहीं कर पाते,क्योंकि चर्बी की तकलीफ है,भोजन भी बिना तेल,मिर्च मसाले का है क्योंकि ब्लड प्रेशर और टेंशन की तकलीफ है, हार्ड की तकलीफ अधिकतर इन्हीं लोगों को होती है तो क्या हम इस सारे स्वरूप को ही सुखी जीवन कहते हैं? सुखी वह नहीं है जिसके पास मोटर बंगला है, वरन वह है जो चैन की नींद सोता है और स्वस्थ मानसिकता का मालिक है.करवटें बदलते रहने वालों को सुखी जीवन का मालिक कैसे कहेंगे? सुखी जीवन की पहली कसौटी है-सोते ही नींद आ जाए और सुबह होते ही बिना अलार्म के आदमी जग जाए.
समझे,जीवन का मूल्य
हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि प्रकृति ने हम सब लोगों को अधिसंपन्न बनाकर धरती पर जन्म दिया है. हम अपने आप को दिन ही गरीब ना समझें. अपने आप को दीन हीन समझना स्वयं की अज्ञानता है. भगवान ने तो हम लोगों को करोड़पति बना कर ही धरती पर भेजा है, पर क्या हम जीवन का मूल्य समझते हैं? माना कि सोने और हीरे जवाहरात का मूल्य है, पर क्या जीवन से ज्यादा है?वास्तव में जीवन है, तो तुच्छ वस्तु भी बहूमूल्यवान है. जीवन नहीं है, तो मूल्यवान वस्तु भी अर्थहीन है. एक अकेले जीवन के सामने तो, संसार भर की संपदाएं तुच्छ और नगण्य है.
व्यक्ति का जीवन दु:ख इसलिए है, क्योंकि हमें जो प्राप्त है उससे हम संतुष्ट नहीं है. हम भागती दुनिया को देखकर भाग रहे हैं. जरा सोचे कि हम जिस चीज के पीछे भाग रहे हैं क्या वाकई हमें उसकी जरूरत है या हम केवल बटोर-बटोर कर दे तिजोरी भरते जा रहे हैं? आवश्यकताए तो फकीर की भी आराम से पूरी हो जाती है, पर ख्वाहिशे है तो बादशाहों की भी अधूरी रह जाती है. सुखी जीवन का एक ही मंत्र है-जो प्राप्त है वह पर्याप्त है.जो हमें प्राप्त है अगर हम उसी का आनंद लेना शुरू कर दें ,तो सुख कल नहीं उसका वरदान आज है.
दु:ख इतना बड़ा नहीं जितना मान कर बैठ जाते हैं:
कुछ लोग नकारात्मक सोच के हैं.उन्होंने खुद को दु:खी मान लिया है. वह इतने दु:खी नहीं है जितना उन्होंने अपने आप को मान लिया है, अगर दु:खी भी है तो दुनिया में कोई ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान ना हो, मन से दुखी है तो उसका भी समाधान है और तन से दु:खी है तो उसका भी समाधान है.
दुनिया में कुछ लोग तन से दु:खी हैं तो कुछ लोग मन से. खुद को दु:खी मानने से दु:ख और बढ़ता है.सुख और दु:ख दोनों को जीवन का हिस्सा मान ले तो, सुख का कभी गुरुर नहीं होगा और दु:ख का कोई गिला नहीं होगा.
जीवन के संपूर्ण सौंदर्य और माधुर्य के लिए केवल हमारा रोग मुक्त होना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् शारीरिक आरोग्य के साथ विचार और कर्म की स्वच्छता और समरसता भी जरूरी है.श्रंगार प्रसाधनों अथवा जूते- चप्पल- सैंडल और कपड़े के ऊंचे- नीचे पहनावे को सुख-सौंदर्य का आधार न समझे. आपका कपड़ा फट गया है तो उसकी चिंता क्यों करते हो? यहां तो लोग फटी जींस और टुकड़े-टुकड़े जोड़कर बनाए ड्रेस को भी यह नए युग की शानदार फैशन समझते हैं.पहले टैटू केवल आदिवासी लोग अपने शरीर पर बनाया करते थे, लेकिन आज तो इसका फैशन बन गया है. केवल मन को मनाने की जरूरत है, मन को अगर सेट कर लो तो जीना बहुत आसान हो जाएगा.
How to live a happy life
Reviewed by Avi pushkar
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10:18 PM
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Nice
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